ऋषिकुल श्रेष्ठ महाराज अन्जनि की तपोभूमि की संज्ञा से अलंकृत महराजगंज की पवित्र भूमि गुरू गोरक्षनाथ की पवित्र पीठ एवं विशाल जनपद गोरखपुर का उत्तरी भाग रहा है। पूरे विश्व को शन्ति का उपदेश देने वाले महापुरूष महात्मा बुद्ध का जन्म स्थान लुम्बिनी महराजगंज जनपद के पड़ोसी जनपद सिद्धार्थनगर के समीप स्थित है। जनपद के पश्चिमोत्तर में महात्मा बुद्ध ने अपनी जीवन यात्रा प्रारम्भ की तो इसी जनपद के पूर्वी जनपद कुशीनगर में उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा पूरी कर ली, जो उनके महापरिनिर्वाण स्थली के रूप में विश्वविख्यात है।
इस प्रकार जनपद की चतुर्दिक सीमाएँ अन्तर्राष्ट्रीय स्थानों की जनपदीय सीमा को स्पर्श करती हुई घिरी हैं।ऐसे सुरम्य, मनोहारी एवं धन-धान्य से परिपूर्ण क्षेत्र पर युग कर्मवीर, क्रान्तिकारी विद्वान स्व. शिब्बन लाल सक्सेना की दृष्टि पुरूष पड़ी। प्रो. सक्सेना जी के व्यक्तिगत सर्वेक्षण में पता लगा कि यह क्षेत्र अन्न धन से पूरित है परन्तु यहाँ शिक्षा का पूर्णतया अभाव है। इसी दृष्टिकोण से उन्होंने अपने आदर्श गणेश शंकर विद्यार्थी की स्मृति में सन् 1938 ई. में इस विद्यालय की स्थापना की। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के कर कमलों से इस विद्यालय के शास्त्री ब्लाक की नींव डलवायी। आज गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक इण्टर कॉलेज लगभग पाँच हजार छात्र-छात्राओं के साथ संचालित है। यह संस्था स्वयं का विकास करने के साथ-साथ कई संस्थाओं की मातृसंस्था भी है। स्व. सक्सेना जी के प्रयास से भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू, द्वितीय प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री, प्रथम खाद्यमंत्री स्व. रफी अहमद किदवई एवं अजित प्रसाद जैसी अमर हस्तियों ने समय-समय पर यहाँ पदार्पण किया। 20 अक्टूबर 1985 ई. को प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना अपने तमाम सपनों और योजनाओं को अधूरा छोड़कर ब्रह्मलीन हो गये। प्रो. सक्सेना के दिवगंत होने के पश्चात् सन् 1985 से 2020 तक उनके उत्तराधिकारी के रूप में डा. बलराम भटट् जी के कुशल प्रबन्धन में विद्यालय ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किये। सन् 2020 से अद्यतन डा. बलराम भटटू जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री चन्द्रमोहन भटट् जी के कुशल प्रबन्धन में संस्था प्रगति के पथ पर अनवरत अग्रसर है।